मोर पांखी होतिस त उड़ के आजातेव,
मैं तोर अंगना म बईठ के मया गातेव।
तै मोला भले एक दो टक मत निहारते,
लेकिन मैं तो तोला कई टक निहारतेव।।
बनके कोइली सावन म सुर राग लगातेव,
एक संग कई राग घेरी भेरी गुनगुनातेव।
तै मोर संग भले कुछु सुर मत सुरियातेच,
लेकिन मैं तोर बर अब्बड़ सुर सुरियातेव।।
रतिहा म का जोगनी कस बन के उड़ातेव,
सपना म तोर ले बईठ के मैं गोठियातेव।
तै भले मोर संग एक नैना मत लड़ातेच,
पर मैं तोर संग कई बार नैना लड़ातेव।।
भंवरा होतेव त पुरा बगिया घुम आतेव,
अच्छा से तोर बर वो फूल तोड़ लातेव।
तै भले मोला झन दे वो मोंगरा गुलाब,
पर मैं तोर बर सतरंगी फूल सजातेव।।
संगवारी रे तोर रुप के का खजाना हे,
थोकन निहार न आए तोर दिवाना हे।
ऐना ला देख के तोर भारी सुरता आथे,
मयारू रे मोला तोर संग घर बसाना हे।।
"पी एस नंद वर्मा"
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